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लंदन रिटर्न राज वसावा भारत के आदिवासियों की नई आवाज

Harshit Sharma 17 April 2019 11:04 PM National 87391

लन्दन से पढ़कर आया आदिवासी नौजवान बन रहा है भारत के आदिवासियों की आवाज

राजेश भाई वसावा उर्फ़ राज वसावा गुजरात का वह नाम है जो किसी पहचान का मोहताज नहीं। एक बेहद आम आदिवासी परिवार से आने वाला यह 36 साल का नौजवान। जो पिछले पाँच-छः सालों से गुजरात सहित पूरे हिन्दुस्तान में, आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों को लेकर गाँव-गिरांव, जंगलों से होते हुए दिल्ली की सड़कों पर संघर्ष करता नजर आ रहा है.

बेहद कम समय में भारतीय राजनीति के पटल पर पहचान बनाने वाली आदिवासी समाज की बड़ी पार्टी भारतीय ट्राइबल पार्टी से गुजरात के छोटा उदयपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव के मैदान में अपनी उम्मीदवारी कर रहा है.

यह वही पार्टी है, जो हालिया में हुए राजस्थान से दो विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की. जो वोटों के प्रतिशत के आधार पर बहुत मजबूती से, देश के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में तेजी से पकड़ बनाने में सफल हुई है. जिस पार्टी के संस्थापक छोटू भाई वसावा हैं. जो वर्तमान में गुजरात की विधानसभा में लगातार स्वतंत्र रूप से सात बार चुन कर पहुंचें हैं. जो खुद भरुच से अपनी ट्राइबल पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ रहें हैं.

लंदन से पढ़कर लौटा गुजरात का यह नौजवान अपने जुझारू तेवर व संघर्षों के कारण बहुत कम समय में आदिवासी समाज के युवाओं के बीच लोकप्रिय हो चुका है। समाज के बड़े बुजर्गों, महिलाओं को एक उम्मीद की किरण बन कर उभरा है.

जो आदिवासी समाज के लिए एक स्वतंत्र आवाज बनकर राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर उभर रहा है. जिसे छोटा उदयपुर लोकसभा क्षेत्र के रिमोट से रिमोट एरिया के लोग बाकायदा जानते और पहचनाते हैं. जिसने लाखों आदिवासी परिवार की बेदखली को लेकर दिल्ली में पार्लियामेंट स्ट्रीट से लेकर जंतर-मन्तर तक हुए मार्च का नेतृत्व करते हुए भारी आक्रोश दर्ज कराया था. जिससे सुप्रीम कोर्ट को मजबूरन उस फैसले पर रोक लगानी पड़ी थी. जो लगातार अपने कैंपेन के माध्यम से क्षेत्र के लोगों को उनके अधिकारों के माध्यम से जागरूक कर रहा है.

राज वसावा से बात-चीत करने पर पता चला की. उन्हें इस चुनाव में देशभर के लोगों से सहयोग मिल रहा है. खासतौर पर, देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, चाहे गुजरात का एक मात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय हो या फिर देश की राजधानी दिल्ली में मौजूद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय।

चूँकि आदिवासी समाज के संघर्षों से उपजी यह पार्टी, नई होने की वजह से चुनाव अभियान के दौरान तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. जो अपने चुनाव खर्च के लिए लोगों से क्राउड फंडिंग की अपील कर रहा है. जिसका जमीन से लेकर सोशल मीडिया पर सकारात्मक रुझान प्राप्त हो रहा है. संवेदनशील लोग सहयोग के लिए लोग आगे आ रहें हैं.

आगे की बातचीत में राज का मानना है, “जब तक आदिवासी समाज का हर एक नौजवान अपने संवैधानिक मौलिक अधिकारों को लेकर जागरूक नहीं होगा। तब तक आदिवासी समाज का शोषण होता रहेगा। उसका घर उजड़ता रहेगा। चाहे भाजपा आये, कांग्रेस की सरकार आये । अडानी-अम्बानियों जैसे लुटेरे पूंजीपतियों के इशारे पर जल, जंगल और जमीन की लूट जारी रहेगी।

इसलिए हमें दोनों सरकार के विपक्ष में, सदन में बैठकर आदिवासी विरोधी नीतियों पर आवाज बुलंद करना है. ताकि पूरे देश के लोगों को आदिवासी समाज का असल दर्द से वाकिफ हो सकें।

आज चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस। इन पार्टियों के टिकट से जीते हुए अब तक के आदिवासी समाज के नेता, इन पार्टियों के गुलाम हैं। जो आदिवासी समाज का लूट और दमन होने के बावजूद खामोश होकर परोक्ष रूप से उस लूट में शामिल हैं. क्योंकि इस मुल्क में धनबल और बाहुबल का सहारा लेकर राजनीति करने वाली, ये दोनों पार्टियां कारपोरेट की गुलाम हैं.

यही गुलामी इनको जल, जंगल और जमीन को लूटने के लिए छूट देती हैं. जो मासूम आदिवासी समाज पर ख़ास लेबल चस्पा कर इन पर हिंसा और दमन करती हैं. जब तक यह लूट, हिंसा और दमन का चक्र रुकेगा नहीं. तब तक मेरे जैसा कोई न कोई खुद्दार आदिवासी नौजवान इन पूंजीपरस्त पार्टियों के खिलाफ संघर्ष करता रहेगा। समाज के बदलाव और बेहतरी के लिए अपना जीवन आदिवासी समाज के लिए समर्पित करता रहेगा।

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