नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी पर 32 साल से कैसे है प्रचंड की पकड़?

jayhind-admin 07 January 2022 12:11 PM Articles 89467

35 साल की उम्र में पहली बार नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ( सीपीएन-मशाल) के महासचिव बनने वाले पुष्प कमल दाहाल 67 वर्ष की आयु में एक बार फिर सीपीएन (माओवादी) केंद्र के अध्यक्ष के रूप में चुन लिए गए हैं.

समय -समय पर अलग-अलग नामों से जाने गए प्रचंड उन चुनिंदा नेपाली नेताओं में से एक हैं जो लगातार 32 सालों से पार्टी का शीर्ष पद संभाल रहे हैं. एक मामूली परिवार में जन्म लेने वाले प्रचंड ने दो बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में भी कार्य किया है.

कहा जाता है कि 25 साल तक भूमिगत रहने वाले प्रचंड के नेतृत्व में दस साल का सशस्त्र संघर्ष चलाया गया. और ये संघर्ष नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन का एक बड़ा कारण रहा है. माओवादी इस संघर्ष को एक ‘जनयुद्ध’ के रूप में देखते हैं.

प्रचंड के नेतृत्व वाले संघर्ष में कई निर्दोष नागरिकों के मारे जाने, गायब किए जाने, और विस्थापित किए जाने को लेकर उनकी आलोचना की जाती है. शांति वार्ता के माध्यम से चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बाद, उनके नेतृत्व में सीपीएन-माओवादी संसद में सबसे बड़ी पार्टी बन गई.

लेकिन इसके नौ महीने के भीतर ही उन्होंने सरकार के नेतृत्व से इस्तीफा दे दिया.

प्रचंड की शुरुआत कहां और कैसे हुई?

साल 1954 में पश्चिमी नेपाल में कास्की ज़िले के ढिकुरपोखारी गाँव में जन्मे प्रचंड का राजनीतिक सफर एक अध्यापक के रूप में शुरू हुआ.

साल 1971 में मात्र 17 वर्ष की आयु में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनने वाले प्रचंड अलग – अलग राजनीतिक भूमिकाओं में आगे बढ़े.

लेकिन अपने संगठन के बाहर उनकी छवि एक शिक्षक की ही रही.

कृषि में स्नातक तक की पढ़ाई करने वाले प्रचंड भूमिगत होने से पहले तक गोरखा ज़िले के भीमोदय माध्यमिक विद्यालय में पढ़ाते थे.

उनके साथ काम करने वाले अध्यापक बताते हैं कि प्रचंड ज़रूरत पड़ने पर विज्ञान, गणित और अंग्रेजी आदि विषय भी पढ़ा लेते थे.

लेकिन गोरखा में प्रचंड के मकानमालिक और उनके साथी शिक्षक रहे गणेश कुमार श्रेष्ठ बताते हैं, “मुझे नहीं पता था कि वह राजनीति में थे. और उस समय राजनीतिक संगठन बनाने और बैठकों में हिस्सा लेने जाया करते थे.”

जब स्कूल की छुट्टियां हुआ करती थीं तो प्रचंड गांव जाते थे और हमें बताते थे कि वह गांव वालों को खाद के गड्ढे और शौचालय बनाना सिखाएंगे.

उन्होंने कहा, “प्रचंड अपने स्वेटर की लंबी बाहों में प्रतिबंधित सामग्री और किताबें छिपाकर लाते थे और उन्हें पढ़ा करते थे.”

श्रेष्ठ बताते हैं, “शिक्षक के रूप में काम करते हुए प्रचंड ने एक बार कहा कि वह शिक्षक पद से इस्तीफा देकर अपने गृह नगर चितवन ज़िले लौट जाएंगे. उन्होंने कहा था कि वह एमएससी की पढ़ाई करने के लिए चितवन के रामपुर इलाके में जाएंगे. लेकिन बाद में पता चला कि पार्टी ने ही उन्हें पहले गोरख़ा ज़िले के अरुघाट भेजा था. और फिर पार्टी ने ही उन्हें वापस चितवन बुला लिया.”

देश में माओवादी युद्ध शुरू होने के बाद तत्कालीन शाही सरकार माओवादी कमांडर प्रचंड की तलाश शुरू कर दी.

गोरखा जहां प्रचंड पढ़ाया करते थे, उसी स्कूल में राम कुमार श्रेष्ठ प्रधानाध्यापक थे और जनयुद्ध के फैलने के कुछ साल बाद, प्रचंड के गृह ज़िले चितवन के मुख्य ज़िला अधिकारी बने.

श्रेष्ठ कहते हैं, ”जब मैं सीडीओ बना तो (तत्कालीन) गृह मंत्री वामदेव गौतम ने मुझसे कहा कि आप उन्हें भली – भांति जानते हैं और उन्हें तत्काल गिरफ़्तार कर लें.”

प्रचंड को बहुत कम लोग जानते थे. और वह युद्ध शुरू होने से पहले ही भूमिगत हो चुके थे.

श्रेष्ठ का कहना है कि आम जनता में इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि प्रचंड नाम का कोई व्यक्ति है भी या नहीं.

माओवादियों ने 20 मार्च 1999 को जनादेश पत्रिका में प्रचंड की एक तस्वीर प्रकाशित की थी.

श्रेष्ठ बताते हैं कि “इस तस्वीर को देखने के बाद सरकारी अधिकारी भी गोरखा आकर मुझसे पूछा करते थे कि तस्वीर में दिख रहे शख़्स ही प्रचंड हैं अथवा नहीं.”

“मुझसे पूछा गया – आप उसके दोस्त हैं, पुष्प कमल दाहाल किस तरह के व्यक्ति हैं? क्या वह फोटो में दिख रहे व्यक्ति है?”

इस घटना के 14 सालों बाद पुष्प कमल दाहाल उर्फ प्रचंड की सिफारिश पर राम कुमार श्रेष्ठ नेपाल की अंतरिम सरकार में मंत्री बने.

पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक कैसे पहुंचे प्रचंड

साम्यवादी राजनीति में शामिल होने के 18 साल बाद 35 साल की उम्र में प्रचंड सीपीएन (मशाल) के महासचिव बने.

इस पार्टी में सबसे मुख्य भूमिका महासचिव की ही होती थी. सरल शब्दों में कहें तो प्रचंड ही पार्टी के मुखिया हुआ करते थे. क्योंकि पार्टी में सर्वोच्च पद महासचिव का ही था.

वह एक प्रभावशाली नेता थे लेकिन यंग कम्युनिस्ट लीग में उनकी लोकप्रियता ने उन्हें शीर्ष पद तक पहुंचने में मदद की.

साल 1996 में प्रचंड के नेता मोहन बैद्य के नेतृत्व में उनकी पार्टी मशाल ने शाही सरकार द्वारा घोषित आम चुनाव को बाधित करने के लिए पुलिस चौकियों पर हमला करने की कोशिश की.

नेपाल की साम्यवादी राजनीति में इस घटना को सेक्टर स्कैंडल के नाम से जाना जाता है.

हमला सफल नहीं होने के बाद पार्टी के भीतर मांग की गई कि वैद्य को पार्टी नेतृत्व छोड़ देना चाहिए.

इसके बाद खुद मोहन बैद्य ने अपने पार्टी का नेतृत्व त्याग दिया.

मशाल के तत्कालीन नेता नारायण प्रसाद शर्मा का कहना है कि प्रचंड ने बैद्य को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाने के लिए उनके ख़िलाफ़ आलोचना का माहौल तैयार किया.

शर्मा कहते हैं, ”आलोचना का माहौल को बनाने में प्रचंड की भूमिका थी. उनका गुट लगातार इस मुद्दे को उठा रहा था.”

नारायण प्रसाद शर्मा माओवादी पार्टी की केंद्रीय सभा के भी संस्थापक सदस्य थे. फिलहाल, वह राजनीति में सक्रिय नहीं हैं.

शर्मा कहते हैं, “उस दौर में कहा गया कि ग़लती हुई थी और ग़लती करने वाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जानी चाहिए. और फिर प्रचंड जी आए. यह भी एक अच्छी प्रक्रिया नहीं थी”

शर्मा मानते हैं कि जब क्रान्ति शुरू हुई तो क्रांतिकारी दल के नेता के ख़िलाफ़ कार्रवाई किया जाना उचित नहीं था. और बैद्य ने उस समय वह फ़ैसला लेकर उदारता का परिचय दिया.

हालांकि, ‘नेपाली क्रांति की समस्याएं भाग- II’ में बैद्य ने लिखा है कि क्रांति की आवश्यकता के कारण उन्होंने नेतृत्व छोड़ दिया.

कुछ साल बाद प्रचंड ने मशाल का नेतृत्व संभाला और बाबूराम भट्टाराई, हरिबोल गजुरेल, निर्मल लामा और रूपलाल विश्वकर्मा के नेतृत्व वाली छोटी कम्युनिस्ट पार्टियों को एक साथ जोड़ा.

और साल 1992 में आयोजित आम सम्मेलन में पार्टी का नाम बदलकर एकता केंद्र कर दिया.

और इसी अधिवेशन में प्रचंड एक बार फिर से महासचिव चुने गए.

पार्टी में कैसे बनाई मजबूत जगह

यद्यपि एकता केंद्र पार्टी में नेतृत्व के स्तर पर कोई विवाद नहीं था.

लेकिन पुराने कम्युनिस्ट नेताओं का कहना है कि बाबूराम भट्टाराई की सार्वजनिक छवि बहुत मजबूत थी. लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच प्रचंड ख़ासे लोकप्रिय थे.

ये उस दौर की बात है जब एकता केंद्र के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच चीन की माओवादी क्रांति को लेकर दिलचस्पी बढ़ रही थी.

और एक समय बाद एकता केंद्र पार्टी का नाम बदलकर कम्युनिस्ट पार्टी इन नेपाल (माओवादी) या नेकपा (माओवादी) रखा गया.

जनयुद्ध शुरू होने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच से ये मांग उठी कि पार्टी नेतृत्व को केंद्रीकृत किया जाना चाहिए.

इसी दौर में पार्टी में एक सर्कुलर जारी हुआ जिसमें पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा गया कि वे उनके आलेख में क्रांति में प्रचंड की भूमिका की प्रशंसा करें.

इसके बाद माओवादियों ने प्रचंड को पार्टी नेतृत्व के रूप में स्थापित करने के लिए उनकी तस्वीर प्रकाशित करने का फ़ैसला किया.

इस फ़ैसले से प्रचंड पार्टी के भीतर और बाहर प्रसिद्ध हो गए.

नारायण प्रसाद शर्मा याद करते हैं कि प्रचंड को स्थापित करने के लिए उन्हें उद्धृत करने और एक तस्वीर प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया था.

उन्होंने कहा, “वह इतने स्थापित नहीं थे और किरण (मोहन बैद्य) जी पार्टी के अंदर और बाबूराम जी बाहर स्थापित हो गए थे. इससे भ्रम पैदा हुआ कि नेता कौन था और नेता की पहचान करना आवश्यक था. इससे प्रचंड को पार्टी में अपनी जगह मजबूत करने में मदद मिली.”

संभावित उत्तराधिकारियों को किनारे किया जाना

साल 1989 में सीपीएन (मशाल) के प्रमुख बनने के बाद से प्रचंड बीते 32 वर्षों से पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं.

बीते तीन दशकों से प्रचंड के एकछत्र राज में काम कर रहे माओवादी पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बीती 2 जनवरी को संपन्न हुए आठवें आम सम्मेलन में मांग की है कि पार्टी के संविधान में संशोधन किया जाए ताकि एक व्यक्ति एक ही पद पर दो कार्यकाल से अधिक न रह सके.

लेकिन प्रचंड के नेतृत्व को किसी ने चुनौती नहीं दी.

बता दें कि लगभग 27 साल पहले जब पुष्प कमल दाहाल की दीर्घकालिक जनयुद्ध रणनीति पारित हुई थी तो उसके बाद से गद्दी पर बैठे प्रचंड को माओवादी सशस्त्र संघर्ष के दौरान और उसके बाद भी किसी नेता ने चुनौती नहीं दी.

माओवाद संघर्ष को गहराई से जानने वाले लेखक नेत्र पन्थी अपनी किताब ‘माओवादीभित्र – अंतरसंघर्ष’ में लिखते है कि “युद्ध की शुरुआत के बाद हुई पहली सिलीगुड़ी बैठक में, प्रचंड ने बाबूराम भट्टाराई को ज़रूरत पड़ने पर नेतृत्व करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन भट्टाराई ने प्रचंड को आगे बढ़ने का आग्रह किया.”

हालांकि, इस बैठक में मौजूद रहे नारायण प्रसाद शर्मा कहते हैं कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.

प्रचंड को चुनौती देने के लिए चर्चित कुछ नेताओं का मानना है कि अधिकांश माओवादी नेता जनयुद्ध में पिछड़ गए.

माओवादियों ने युद्ध के दौरान बाबूराम भट्टाराई के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी.

भट्टाराई की पत्नी और माओवादी नेता हिसिला यामी ने अपनी पुस्तक ‘हिसिला’ में उल्लेख किया है कि भट्टाराई और प्रचंड के प्रस्ताव से असहमत अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया है और भट्टाराई के करीबी नेताओं को मानसिक यातना दी गई है.

शर्मा के मुताबिक़, ये संभव है कि प्रचंड को लगा हो कि बाबूराम भट्टाराई उन्हें अपदस्थ कर सकते हैं.

शर्मा कहते हैं, ”बाबूरामजी ने उस समय कुछ गलतियां की थीं, लेकिन यह इतनी बड़ी कार्रवाई करने की हद तक सही नहीं लगता.”

“प्रचंड को शायद इस बात का डर था कि बाबू राम भट्टाराई के अंतरराष्ट्रीय संबंध थे और वह लोगों के बीच भी ख़ासे लोकप्रिय थे.

प्रचंड के करीबी होने के बावजूद, राम बहादुर थापा, जो नेतृत्व केंद्रीकरण प्रस्ताव से असहमत थे, को पार्टी में सांस्कृतिक विचलन के आरोप में हिरासत में ले लिया गया था.”

आरोप लगाए गए और हटाए गए

कुछ साल बाद, थापा पर “लिन पियाओवादी” नेता होने का आरोप लगाकर पार्टी में उनकी भूमिका कम कर दी गई.

लिन पियाओ को एक ऐसे नेता के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने चीनी नेता माओत्से तुंग को जल्द से जल्द बदलने की मांग की थी.

लेकिन बाद में माओवादियों ने थापा पर लगे आरोपों से इनकार किया.

शर्मा याद करते हैं, “चुनवांग बैठक के बाद बादल जी (थापा) के ख़िलाफ़ आरोपों को खारिज कर दिया गया जिसका मतलब था कि इसमें कुछ गड़बड़ थी.”

माओवादी नेताओं ने प्रचंड पर अपना उत्तराधिकारी तैयार नहीं करने का आरोप लगाया.

शांति समझौते मे शामिल होने से पहले प्रचंड ने ‘प्रचंडपथ’ नामक अपनी विचारधारा को सामने रखा था.

लेकिन शांति समझौते में शामिल होने के बाद उन्होंने इस विचारधारा को त्याग दिया.

माओवादियों के शांति प्रक्रिया में प्रवेश करने के बाद, मोहन बैद्य और बाद में बाबूराम भट्टाराई ने प्रचंड के राजनीतिक दस्तावेजों से असहमत होकर अलग-अलग राजनीतिक रिपोर्ट तैयार की.

माओवादियों द्वारा प्रचंड को चुनौती देने वाली प्रमुख घटनाओं में से एक धोवीघाट गठबंधन था.

ललितपुर के धोवीघाट में हुई एक बैठक में प्रचंड के अलावा अन्य वरिष्ठ नेताओं ने प्रचंड पर बाबूराम भट्टाराई को पार्टी का प्रधानमंत्री नामित करने का दबाव बनाया था.

माओवादी युद्ध के दौरान प्रचंड की नेतृत्व क्षमता की बार-बार प्रशंसा करने वाले बाबूराम भट्टाराई में पार्टी का नेतृत्व करने की आकांक्षा थी.

हालांकि, वह 2015 में वह पार्टी से हट गए. इससे पहले मोहन बैद्य और राम बहादुर थापा समेत कई नेताओं ने माओवादियों का साथ छोड़ दिया था.

माओवादियों से अलग हो चुके एक पूर्व नेता नारायण प्रसाद शर्मा का कहना है कि माओवादियों के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसने अतीत से प्रचंड को चुनौती दी हो और उनके जैसा व्यक्तित्व, क्षमता, प्रतिभा या योगदान हो.

शर्मा ने कहा, “संगठन, रणनीति और वैचारिक ज्ञान के मामले में पार्टी के पास प्रचंड जैसा नेता नहीं है. कुल मिलाकर उसके पास उनके जैसे लोग नहीं हैं. उन्होंने एक उत्तराधिकारी बनाने के लिए भी सक्रिय प्रयास नहीं किया.”

“रूस और चीन की घटनाओं ने दिखाया है कि एक क्रांति समाप्त हो सकती है जब पार्टी के पास कोई उत्तराधिकारी न हो.”

प्रचंड की आलोचना

हालांकि, प्रचंड के आलोचकों ने उन पर पार्टी को नेतृत्व नहीं सौंपने का आरोप लगाया है, उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने एक बार बाबूराम भट्टाराई को नेतृत्व की पेशकश की थी.

हाल ही में हिमालय टेलीविजन के साथ एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा था कि वह पार्टी का नेतृत्व सौंपना चाहते थे, लेकिन अन्य नेता नेतृत्व के लिए तैयार नहीं थे.

उन्होंने कहा, “एक बार [द्वितीय संविधान सभा के चुनाव के बाद], पार्टी कमेटी की एक बैठक में, मैंने बाबूरामजी से कहा, ‘मुझे हमेशा वही होना है जो आप हैं और आप भी एक नेता हैं, एक वरिष्ठ नेता हैं, आप में क्षमता है, एक बार मैं आपको मुखिया बनाना चाहता हूं,

माओवादियों के आठवें आम सम्मेलन में भाग लेने वालों ने मांग की है कि पार्टी प्रमुख प्रचंड उस घर से चले जाएं जहां वह रह रहे हैं. उन्होंने न केवल प्रचंड की जीवन शैली के पार्टी और कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुरूप नहीं होने का मुद्दा उठाया, बल्कि नेताओं की संपत्ति की जांच की भी मांग की.

अधिवेशन में उठाए गए एक सवाल का जवाब देते हुए प्रचंड ने कहा कि वह “यदि आवश्यक हो तो एक झोपड़ी में रहने के लिए तैयार हैं”

प्रचंड के तत्कालीन निजी सचिव विकेश श्रेष्ठ के अनुसार, युद्ध के दौरान वह मध्य पश्चिम के पहाड़ी ज़िलों में झोपड़ियों में रहते थे. माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचंड ने खुद एक राजनीतिक दस्तावेज में माओवादी नेताओं की आलोचना की है. उन्होंने कहा कि नेता ‘कमीशन, भ्रष्टाचार, यौन अनैतिकता, व्यक्तिवाद, पद और धन के आदी हो रहे थे’

प्रचंड ने दस्तावेज़ के पृष्ठ 35 पर कहा, “आज पार्टी में व्यक्तिगत पद, प्रतिष्ठा और स्वार्थ के लिए कुछ भी अनुचित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है.” माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचंड के साथ-साथ पार्टी के नेतृत्व में शामिल अन्य नेताओं की जीवनशैली पर भी सवाल उठाया गया है.

पार्टी के जनरल कन्वेंशन में प्रचंड के दस्तावेज पर अलग-अलग विचार रखने वाले युवा नेता लेखनाथ न्यौपाने ने भी नेताओं के ख़र्च के स्रोत पर सवाल उठाया है.

उन्होंने लिखा, “हमारे आंदोलन के पतन और लोगों के साथ संबंधों के कमजोर होने का मुख्य कारण पार्टी नेताओं का अपारदर्शी आर्थिक जीवन है. हम पर भ्रष्टाचार, कमीशन और रिश्वत के माध्यम से अपार संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया गया है. हमारी और हमारे परिवार एवं रिश्तेदारों की जीवनशैली को देखते हुए ये नहीं कहा जा सकता है कि धन-दौलत के प्रति हमारा मोह नही है.”

प्रचंड के छह नाम

प्रचंड ने केवल छह बार अपना नाम बदला है. स्टालिन, जिन्हें प्रचंड राजनीतिक रोल मॉडल मानते थे, ने भी तीन बार अपना नाम बदला. स्टालिन नाम रखने से पहले, उनका नाम कोबा था, और उसका असली नाम जोसेफ विसारियोनोविच जुगास्विली था.

लेनिन का असली नाम व्लादिमीर उल्यानोव था. लेकिन कम्युनिस्ट नेताओं का कहना है कि नाम बदलने के मामले में प्रचंड ने उन नामी नेताओं को पीछे छोड़ दिया.

चितवन के नारायणी विद्या मंदिर में कक्षा 10 में पढ़ते समय, प्रचंड ने अपना नाम छविलाल दाहाल से बदलकर पुष्प कमल दाहाल रख लिया. साल 1981 में पंचायत विरोधी आंदोलन में भूमिगत हुए प्रचंड 20 जुलाई 2006 को बालूवाटार में सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए.

भूमिगत रहते हुए उन्होंने कल्याण, विश्वास, निर्माण और प्रचंड नाम लिया. इससे पहले वे छविलाल से पुष्प कमल बने थे. जब वह एक शिक्षक के रूप में काम कर रहे थे, तब वह कल्याण नाम से जाने जाते थे. इसके बाज मशाल के केंद्रीय सदस्य बनने पर वह विश्वास नाम से जाने गए.

नारायण शर्मा के मुताबिक, “उन्होंने पार्टी को विस्तार देने और मजबूती देने के लिए लेफ़्ट यूनिटी के नाम पर अपना नाम निर्माण रखा. कई पार्टियों के मिलन के बाद वह निर्माण नाम से जाने गए. लेकिन जब युद्ध शुरू हुआ तो निर्माण नाम काफ़ी शांति सूचक लगा. जिस प्रकार रूप और सार के बीच सामंजस्य होना चाहिए, उसी प्रकार एक क्रांतिकारी नेता का नाम क्रांतिकारी होना चाहिए.”

प्रचंड ने बदल दिए छह गठबंधन

अपने नाम और पार्टी के नाम के बाद उन्होंने सबसे ज्यादा गठबंधन बदले हैं. संसदीय राजनीति में आने के बाद, उन्होंने यूएमएल और कांग्रेस और मधेशवादी सहित छोटी पार्टियों के साथ छह बार गठबंधन किया.

उनकी पार्टी ने आम चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया. इसके बाद उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. लेकिन उसे बहुमत नहीं मिला. इसके बाद, प्रचंड ने सरकार बनाने के लिए सीपीएन-यूएमएल के साथ गठबंधन किया.

प्रचंड द्वारा सेनाध्यक्ष रुक्मंगद कटुवाल को हटाने के फैसले के बाद, यूएमएल ने सरकार छोड़ दी और प्रचंड की पार्टी विपक्ष में शामिल हो गई. उन्होंने विपक्षी दलों का मोर्चा बनाया. प्रचंड के नेतृत्व वाले मोर्चे में एक समय में 27 दलों ने भाग लिया.

सेनाध्यक्ष को हटाने वाले फ़ैसले के चलते गठबंधन टूटने के बाद प्रचंड ने 2011 में यूएमएल के साथ अपना गठबंधन फिर से शुरू किया और तत्कालीन यूएमएल अध्यक्ष झल नाथ खनाल को प्रधान मंत्री बनाने में मदद की.

निर्धारित समय के भीतर संविधान का मसौदा तैयार नहीं होने के बाद पहली संविधान सभा भंग हो गयी. दूसरी संविधान सभा के बाद, कांग्रेस-यूएमएल गठबंधन बनने पर प्रचंड अकेले रह गये थे.

नेपाली नेता

संविधान की घोषणा के बाद, प्रचंड यूएमएल के साथ चले गए. केपी ओली के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव दाखिल कर प्रचंड नेपाली कांग्रेस को साथ लेकर प्रधानमंत्री बने.

प्रचंड का न केवल कांग्रेस के साथ एक बड़ा वैचारिक मतभेद था, बल्कि कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा थे, जिन्होंने 2002 में प्रधानमंत्री बनने पर माओवादी नेताओं के सिर पर ईनाम घोषित किया था.

प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के बाद यूएमएल के साथ कड़वे रिश्ते को ख़त्म कर दिया. लेकिन नए संविधान की घोषणा होने के बाद हुए संघीय चुनावों में प्रचंड ने यूएमएल के साथ चुनावी गठबंधन बनाया.

इस चुनाव के बाद प्रचंड ने अपनी पार्टी को यूएमएल के साथ मिला दिया. इसके लिए प्रचंड ने न केवल अपनी माओवादी विचारधारा को त्याग दिया, बल्कि ‘पीपुल्स वॉर डे’ मनाना भी बंद कर दिया, जिस पर उनकी पार्टी को गर्व करती है.

इसके बाद एक समय ऐसा आया जब एक तरफ़ ओली के साथ उनके संबंध बिगड़ रहे थे, वहीं नेपाल की सर्वोच्च अदालत में लंबित एक मामले की सुनवाई जारी थी. इस फ़ैसले में कोर्ट ने प्रचंड की पार्टी और यूएमल के एकीकरण को अवैध ठहरा दिया. इसके बाद प्रचंड ने अपनी पुरानी पार्टी को एक बार फिर खड़ा करके कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का फ़ैसला किया है.

प्रचंड ने बदले पार्टी के छह नाम

वह अब तक छह बार पार्टी का नाम बदल चुके हैं. जब प्रचंड ने राजनीति शुरू की तो वे तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्पलाल समूह में शामिल हो गए.

1989 में जब वे पहली बार पार्टी प्रमुख (महासचिव) बने, तो उनकी पार्टी का नाम सीपीएन-मशाल था। दो साल बाद 1991 में पार्टी का नाम एकता केंद्र हो गया. जनयुद्ध शुरू करने से पहले उन्होंने पार्टी का नाम माओवादी रखा.

संसदीय राजनीति में प्रवेश करने के बाद, उनकी पार्टी और एकता केंद्र मशाल का विलय हो गया और पार्टी का नाम बदलकर एकीकृत माओवादी कर दिया गया. पार्टी को माओवादी केंद्र बनाने के लिए प्रचंड फिर से छोटी कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ एकजुट हो गए.

लेकिन यूएमएल के साथ एकीकरण के बाद उन्होंने पार्टी का नाम बदलकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी कर दिया. परंतु एकीकरण टूटने के बाद प्रचंड पुरानी पार्टी मेकपा (माओवादी केंद्र) के अध्यक्ष बने.

News credit- www. bbc.com/hindi

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