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नर्मदा किनारे मकरसंक्रांति पर बरमान मेला

Harshit Sharma 15 January 2019 11:23 PM Articles 28395

मध्यप्रदेश में जबलपुर से करीब 125 किलोमीटर दूर करेली-सागर मार्ग पर यह मेला आयोजित होता है। इसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली है। यहाँ महाकौशल, विंध्य व बुंदेलखंड के अलावा महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश आदि अन्य राज्यों से आए लोग मौजूदगी दर्ज कराते हैं। नर्मदा किनारे बरमान के मेले तले विभिन्न पृष्ठभूमियों और रीति-रीवाज से जुड़े लोगों का संगम करीब एक महीने तक चलता है।

बरमान घाट मेले का आँखों देखे हाल से अवगत कराती वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता बाबा मायाराम की कलम 

(बरमान घाट मेले का दृश्य)

 

कल का दिन बरमान मेला में बीता. बरमान, नरसिंहपुर जिले में है. जहां से नर्मदा नदी गुजरती है, और नर्मदा के किनारे लगने वाले प्रसिद्ध मेलों में से एक बरमान मेला है.

क्या बुजुर्ग, क्या जवान, महिला, पुरूष और बच्चों की भारी भीड़. कल दोपहर मैं अपनी जीजी ( बहन), भांजे के साथ यहां पहुंचा. करेली से आनेवाली सड़क पर वाहनों का रेला लगा हुआ था.परिवार समेत लोग यहां पहुंचे थे.

हम लोग नरसिंहपुर से मोटरसाइकिल से गए. कुछ देर राजमार्ग से चले और जल्दी से कठौतियां के लिए बारूरेवा नदी पार की. बारूरेवा में पानी देख मैंने जीजी से पूछा. इसमें बहुत पानी है. उसने बताया- बरगी की नहर का है.

अब हम लोगों ने कठौतिया से अंदर के लिए सड़क पकड़ी जो पिपरिया लिंगा के वहां निकली. इस सड़क के दोनों ओर हरे भरे खेतों ने मन मोह लिया. गन्ना के साथ गेहूं और चना बोया गया था. ऐसा मैंने कम देखा है. चना, मसूर, सरसों के खेत थे. गन्ने का गुड़ भी कुछ जगह बन रहा था.

इस पूरी पट्टी में एक जमाने में गुड़ बहुत बनता था . करेली व आमगांव का बाजार गुड़ के लिए बहुत प्रसिद्ध था. अब शक्कर मिलें भी हो गई हैं.

कुछ देर में हम मेला स्थल पहुंच गए. हाथ में झोला, पीठ पर पिट्ठू लटकाए, छोटे बच्चों को कंधे बिठाल लोगों का तांता लगा हुआ था. वाहनों को एकाध किलोमीटर दूर ही रोक लिया गया था. दूर-दूर तक वाहन ढिले हुए थे.

वहां से पैदल चलकर लोग आ जा रहे थे. दूर-दूर तक जनसमुद्र उमड़ा पड़ रहा था. भीड़ ऐसी कि पांव रखने की जगह नहीं.

मैंने एक नजर ऊपर से मेले पर डाली. एकाध किलोमीटर में दुकानों के तंबु ही तंबु. नदी किनारे स्नान करते श्रद्धालुजन. नाव और डोंगियों में नारियल व सामान बीनते नाविक व बच्चे. अस्थाई पुल पर से बहती जनधारा.

फूलों के रंगीन गमले व गुलदस्ते, बांसुरी, गुब्बारे, पुंगी, चश्मे आदि लेकर बेचते फेरी वाले आकर्षित कर रहे थे.

स्नान कर पूजा अर्चना की जा रही थी. बाटी-भरता बनाने के लिए कंडे की अंगीठियां लगी थी. धुआं नथुनों व आंखों में भर जाता था.

नर्मदा के किनारे मेला संस्कृति बहुत प्राचीन है. मेला मिल से बना है. यानी मेल मिलाप. मिलना जुलना. पहले जब गांवों में टीवी नहीं थी. वाहन नहीं थे तब बड़ी संख्या में लोग बैलगा़ड़ियों से मेला जाते थे. दो-चार दिन की तैयारी से. ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों के साथ खाने बनाने के सामान के साथ

मैं खुद अपने परिवार के साथ बैलगाड़ी से जाया करता था छुटपन में. बैलों को अगर ठंड लगती थी उन्हें टाट ओढा दिया जाता था और बैलगाड़ी में उनके चरने के लिए भूसा व चारा भी साथ ले जाते थे.

नदियों के किनारे माझी,कहार व केंवट समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं और उनका जीवन पूरी तरह नदी पर निर्भर था. डंगरबाडी (तरबूज-खरबूज की खेती) करके वे जीवनयापन करते थे.

नर्मदा की कई कथाएं हैं, नर्मदा पुराण भी है. परकम्मावासियों व नर्मदा किनारे के लोगों की कई गाथाएँ हैं. ऐसी नर्मदा के दर्शन मात्र से ही लोग तर जाते हैं. इसीलिए तो आते जा रहे हैं.

हमने स्नान किया. बाटी-भरता का भोजन किया. मेले में घूमे. छोटे बच्चों को खिलौने से खेलते देखा, तो बचपन की याद आई. नर्मदा से मिलना सदैव उसके मिलने के साथ स्मृतियों में खो जाना भी होता है.आंतरिक यात्रा भी होता है जो जारी रहती है.

बाबा मायाराम

(लेख़क वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

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