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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के प्रति क्या था RSS का नजरिया

Sandeep Singh 18 September 2019 12:51 PM Articles 64958

स्वतंत्रता आंदोलन के दरमियान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वैसी किसी भी चीज़ से घृणा करता था। जो भारतीय लोगों के ब्रिटिश हुकूमूत के विरोध या संघर्ष को प्रतिकित करता था।

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का मामला इस दृष्टि से विशेष रूप से प्रासंगिक है।

1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में अपनाया और लोगों से आह्वान किया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में तिरंगा फहराकर और उसे सम्मानित किया जाय (उस समय तक राष्ट्रीय आन्दोलन का ध्वज तिरंगा बन चुका था)।
देश के सभी नागरिकों के प्रति इस ऐतिहासिक आह्वान के प्रत्युत्तर में डॉ. हेडगेवार ने सरसंघ चालक के रूप में एक परिपत्र जारी किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभी शाखाएं ‘भगवा ध्वज’ की पूजा करेगी।

परिपत्र में कहा गया था: ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभी शाखाएं अपने संघ स्थान में ( वह स्थान जहाँ संघ की बैठकें होती थीं) 26 जनवरी 1930 को एक समागम आयोजित करेगी और राष्ट्रीय ध्वज का अभिवादन करेगी, जो भगवा ध्वज है। स्वतंत्रता के सही अवधारणा को समझाने के लिए व्याख्यान आयोजित किये जाने चाहिए’।

इस परिपत्र से साफ हो जाना चाहिये कि जब पूरा राष्ट्र संयुक्त संघर्ष के रूप में ध्वज (तिरंगे) को नमन कर रहा था। तब संघ धर्म के नाम पर लोगों विभाजित करने के लिए अलगाववादी आह्वान कर रहा था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस परिपत्र को अक्सर स्वतंत्रता संघर्ष में अपनी भागीदारी के प्रमाण के रूप में पेश करता है। जबकि इससे साफ होता है वह विदेशी शासन का विरोध करने की बजाय एक भगौड़े और चाकरी करने वाले संगठन के रूप में प्रदर्शित करता है।

इससे भी अधिक, संघ ने अपने अग्रणी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया था कि “स्वतंत्रता की वास्तविक अवधारणा लोगों को समझाओ’ जिसका मकसद था एक हिंदू राष्ट्र का सृजन, न कि धर्मनिरपेक्ष भारत का। उस दौर में कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष भारत की स्थापना के संकल्प को लेकर स्वतंत्रता संग्राम में आन्दोलित था।

साभार: धर्म, सत्ता और राजनीति, 126-127.

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