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संघर्ष में ही लोकमुक्ति -सन्दीप सिंह

Sandeep Singh 18 September 2019 11:48 AM Articles 97263

राजनीति में सिर्फ़ येन-केन प्रकारेण अगर सत्ता पाना लक्ष्य हो जाय। विचारों का क्षरण हो जाय। मूल्यों का पतन हो जाय। सेवा और संघर्ष शब्दकोश से ग़ायब हो जायें। सत्ता हाथ से निकलने की छटपटाहट चरम पर हो।

तो ऐसे लोगों से बदलाव की उम्मीद करना भारी बेमानी है। अगर यही नीति और नीयत आगे भी कायम रही तो सत्ता की प्यास में तडफ़-तडफ़ कर मर जायेंगे। मगर सत्ता हासिल नहीं होगी। काल की नियति से अकाल कायम रहेगा। राजनीति का भविष्य आभासी गैर-प्रासंगिक हो जाएगा।

जब तक कथनी और करनी एक न होगी। मूल्यों व विचारों पर आधारित साध्य और साधन नहीं होंगे। ईमान पर खरे और अनैतिकता से परे नहीं होंगे। नैतिक बल पर खड़े होने की ताकत नहीं होगी। बेख़ौफ़ होकर ईमान की बात कह नहीं पाएंगे। सत्य का साथ मजबूती से दे नहीं पाएंगे। तब तक कुछ न हो पायेगा।

उम्मीद रखने वाले घुट-घुट कर मर जायेंगे। बदलाव से मोहभंग हो जाएगा। जो बचेंगे। वो विकल्प की तलाश में निकल जाएंगे। जिसमें वे आपकी हत्या करना सबसे ज्यादा जरूरी समझेंगे। क्योंकि इस हालात के लिए आप जिम्मेदार माने जाएंगे।

आप एक सतत युद्ध में हैं, जहाँ सामने वाले के पास अंधकार फैलाने की असीम ताकत है। उसके पास छद्म रूप धारण करने अनिगनत तरीके हैं। झूठ और अफ़वाह फैलाने की महामशीन है। षणयंत्र रचना और अंजाम तक पहुंचाना पुरानी आदत है। ऐसे लोगों से लिजलिजाहट और लचीलेपन से सामना नहीं कर सकते।

इसके लिए ‘खोनें का डर’ और ‘पाने की लालच’ से परे होना होगा।

अपने वृतांत और विमर्श को धार देनी होगी। अपनी धारा को पहचानना होगा। विपरीत धारा से सीधे टकराना होगा। मानवीय मूल्यों के धरातल पर खड़े होकर धारा के विपरीत अपनी बात मनवानी होगी। हर हाल में जनभावनाओं को अपने पक्ष में सरसेटना होगा। अगर ऐसा नहीं करेंगे, तो मजाक के पात्र बन जाएंगे। सार्वजनिक जीवन से गंभीरता का पूर्ण क्षरण हो जाएगा।

इसलिये अपनी बुद्धि पर जड़े ताले को अपनी चाभी से खोलिये। हर बार नई चाभी की तलाश मत करिए। खुलकर ईमान की बात करिये। अकेले होने के डर से मुक्त हो जाइए क्योंकि बदलाव की लम्बी यात्रा बेख़ौफ़ होकर तय करनी होगी। चुनौतियों से लड़ना होगा। समस्याओं से जूझना होगा। जरूरी मुद्दों से टकराना होगा।

अपनी हर एक संकल्पित सोच को मजबूत करना होगा, अंजाम तक ले जाने का भरसक प्रयास करना होगा क्योंकि लोकमुक्ति का भविष्य इसी में निहित है।

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